Tereza Sebesta
बर्फ़ की आख़िरी बूंद
सुबह-सुबह, एक लटकी हुई बर्फ की बूंद एक नल के ऊपर जागी और एक नया दिन देखकर बहुत खुश हुई। लेकिन... यह क्या है? उसे एहसास हुआ कि वह गलती से बहुत देर से जागी थी। सर्दियां खत्म हो चुकी थीं। अब वह क्या करेगी?


एक बार की बात है। एक हरे-भरे मैदान में, ओक के पेड़ों के पास चींटियों का एक बड़ा घर था जहाँ सभी कुछ न कुछ
“अरे चींटियों, तुम क्या उठा रही हो?”
“हम सर्दियों के लिए खाना इकट्ठा कर रही हैं। जब सर्दी का मौसम आएगा और बर्फ गिरेगी तो यह सब ढक जाएगा। सब कुछ जम जाएगा और तब कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा।” उनमें से एक चींटी ने समझाया।
टिड्डा ज़ोर से
“अरे चींटियों! आज का दिन कितना
लेकिन चींटियों ने उसकी बात नहीं मानी। वे चुपचाप अपने काम में लगी रहीं और जो कुछ उन्हें मिलता गया जमा करती रहीं ताकि सर्दियों में उनके पास सब कुछ हो। उन्होंने बड़ी-बड़ी पत्तियाँ और छोटे-छोटे तिनके जमा किए ताकि वो आने वाली सर्दियों के लिए चींटियों के बाड़े को मज़बूत बना सकें।
वे गहरे जंगल से मशरूम, ब्लूबेरी और अन्य फल भी इकट्ठा कर रहे थे ताकि पूरे साल कुछ खाने को मिल सके। मूर्ख टिड्डा अब भी मैदान में इधर-उधर उछलता
"आओ, मेरे साथ खेलो" वह पुकारता। लेकिन मेहनती चींटियाँ बस अपने…