टिड्डा और चींटियाँ

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ऐसोप की इस प्रसिद्ध कहानी के इस रूपांतर से हमें यह सिखने को मिलता है कि हमें हमेशा भविष्य के बारे में सोचना चाहिए। जब युवा टिड्डे ने देखा कि गर्मी के मौसम में चींटियाँ ठंड के लिए सामान इकट्ठा कर रही थीं, तो वह हँस पड़ा। इतने अच्छे मौसम में कोई कैसे काम कर सकता है? लेकिन दिन बीतते गए, और जल्द ही सूरज की गर्मी और रोशनी की जगह ठंडी बर्फ ने ले ली। जहाँ चींटियों के पास सब कुछ तैयार था, वहीं टिड्डे को किसी ऐसे का इंतज़ार करना पड़ा जो उस पर दया कर दे।
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टिड्डा और चींटियाँ
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एक बार की बात है। एक हरे-भरे मैदान में, ओक के पेड़ों के पास चींटियों का एक बड़ा घर था जहाँ सभी कुछ न कुछ कर रहे थे। वहाँ सभी चींटियाँ आगे-पीछे मार्च कर रही थीं, और तरह-तरह की चीज़ें उठा रही थीं। पास ही एक जवान टिड्डा घास खा रहा था। वो थोड़ी देर तक चींटियों को देखता रहा, फिर आख़िर उसने पूछ ही लिया,
“अरे चींटियों, तुम क्या उठा रही हो?”

“हम सर्दियों के लिए खाना इकट्ठा कर रही हैं। जब सर्दी का मौसम आएगा और बर्फ गिरेगी तो यह सब ढक जाएगा। सब कुछ जम जाएगा और तब कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा।” उनमें से एक चींटी ने समझाया।

टिड्डा ज़ोर से हँस पड़ा। उसने सोचा, “ये लोग कितने बेवकूफ हैं जो इतनी अच्छी गर्मियों की धूप में भी काम कर रही हैं,”। फिर वो चींटियों से बोला,
“अरे चींटियों! आज का दिन कितना सुहाना है! थोड़ी मस्ती कर लो, खेलो-कूदो। क्या तुम्हें नहीं पता, जब मौसम इतना अच्छा हो, तब सिर्फ़ बेवकूफ ही काम करते हैं?”

लेकिन चींटियों ने उसकी बात नहीं मानी। वे चुपचाप अपने काम में लगी रहीं और जो कुछ उन्हें मिलता गया जमा करती रहीं ताकि सर्दियों में उनके पास सब कुछ हो। उन्होंने बड़ी-बड़ी पत्तियाँ और छोटे-छोटे तिनके जमा किए ताकि वो आने वाली सर्दियों के लिए चींटियों के बाड़े को मज़बूत बना सकें।

वे गहरे जंगल से मशरूम, ब्लूबेरी और अन्य फल भी इकट्ठा कर रहे थे ताकि पूरे साल कुछ खाने को मिल सके। मूर्ख टिड्डा अब भी मैदान में इधर-उधर उछलता फिर रहा था और अपने दिन बर्बाद कर रहा था। जब भी वह चींटियों के पास से गुज़रता, वह उन्हें मस्ती करने और धूप का आनंद लेने के लिए मनाने की कोशिश करता।

"आओ, मेरे साथ खेलो" वह पुकारता। लेकिन मेहनती चींटियाँ बस अपने…

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