चींटियों की दुश्मनी बदली दोस्ती में!

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काली और लाल चींटियाँ स्वाभाविक दोस्त नहीं होतीं। लेकिन जब जंगल में एक भयंकर तूफान आता है, तो इससे हमारी कहानी के सभी कीड़े प्रभावित हो जाते हैं। दोनों चींटियों के घर समान रूप से खतरे में पड़ जाते हैं। ये कट्टर दुश्मन अपने मतभेद भुलाने के आदी नहीं हैं, लेकिन अचानक वे खुद को जीवित रखने के लिए एकजुट हो जाते हैं। आइए देखें कि वे अपनी दुश्मनी को कैसे सुलझाते हैं...
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एक शाम, काली चींटियों का एक झुंड अपने घर यानी बाँबी की तरफ़ जा रहा था। पूरे दिन चीड़ के पेड़ की सुई जैसी लंबी नुकीली पत्तियाँ और छोटी टहनियाँ लाने-लेजाने में उनका दिन काफ़ी व्यस्त बीता था, और अब वे बस अपने बिस्तर में घुस कर, एक अच्छी नींद लेना चाहते थे।

मगर तभी अचानक, उनमें से एक चींटी को पुराने बलूत के पेड़ के नीचे एक बड़ी, रसीली रसभरी दिखाई दी। उसने तुरंत अपने काफ़ी सारे दोस्तों को मनाया कि वे उसे लाने के लिए उसके साथ चलें। और कहा कि रानी चींटी ऐसा तोहफा लाने के लिए उन्हें ज़रूर धन्यवाद देंगी!

मगर जैसे ही वे रसभरी के चारों ओर खड़े हुए, उन्हें पेड़ के तने के पास नीचे से कदमताल करते हुए नन्हे कदमों की आवाज़ सुनाई दी। लाल चींटियों की फौज तेज़ी से चलते हुए उनके पास आ रही थी!

अब ये तो सभी जानते हैं कि काली चींटियों और लाल चींटियों में दोस्ती नहीं है। काली चींटियाँ ईमानदारी से काम करती हैं, अपना घर यानी बाँबी बनाती हैं और अपनी रानी को खिलाती हैं, जबकि लाल चींटियों को जंगल का डाकू माना जाता है।

यूँ तो काली चींटियाँ शांत स्वभाव वाली होती हैं, मगर इस रसभरी के लिए वे बहादुरी से लड़ने लगीं। वैसे तो लाल चींटियाँ गिनती में ज़्यादा थीं, लेकिन वे एक टीम की तरह काम नहीं कर रही थीं, इसलिए उनकी ताकत कम पड़ने लगी। काली चींटियाँ लड़ाई जीत गईं।

उन्होंने तुरंत किसी तरह से रसभरी को अपने कंधों पर उठाया और इससे पहले की डाकू उन पर हमला करते, वहाँ से भाग गईं। एक बार जब वे अपने घर पर पहुँच गईं, तो रानी के लिए यह तोहफ़ा लाने वाली बहादुर चीटियों को इनाम दिया गया। रात को अच्छा खाना खाकर, फिर वे सभी सोने चली गईं।

मगर उस रात,…

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