क्लेमेंट अपने साथी बच्चों को कुछ अजीब-सा लगता था। जब बाकी बच्चे सड़क पर तरह-तरह के खेल खेलते, क्लेमेंट हमेशा एक किनारे खड़ा रहकर पक्षियों, तितलियों या कीड़ों को देखा करता। उसे खासतौर पर ये देख कर बड़ा मज़ा आता कि वे उड़ सकते हैं और वो सोचता कि वे ऐसा कैसे कर पाते हैं।
बच्चे हँसते हुए कहते,"देखो, क्लेमेंट फिर से सूरज तक उड़ कर जाने का सपना देख रहा है," या ये कहकर उसका मज़ाक उड़ाते कि वह पेड़ पर उड़कर उस डाली पर बैठे गौरैया के पास जा बैठेगा। हा-हा!"
"वो गौरैया नहीं है, बेवकूफ, वो तो माउसबर्ड है।"
"गौरैया हो या माउसबर्ड, तुम कभी उड़ नहीं सकोगे, क्लेमेंट। इस सपने को भूल जाओ और ज़मीन पर वापस आ जाओ," बच्चे चिल्लाते।
लेकिन क्लेमेंट को उनके चिढ़ाने की कोई परवाह नहीं थी।
"फिर भी मैं उड़ूंगा, तुम देखना," वह हमेशा खुद से बड़बड़ाता। वह अपने सपने को यूँ ही छोड़ देने वाला नहीं था।
क्लेमेंट को चित्र बनाना भी बहुत पसंद था, और वह बहुत अच्छा चित्रकार था। उसे अकेले जंगल में कहीं बैठना अच्छा लगता था, उन चिढ़ाने वाले बच्चों से दूर, हाथ में कागज़ और पेंसिल लेकर। और वह चित्र बनाता रहता, बनाता रहता और यही करता रहता। चाहे पेड़ों के ऊपर उड़ते पक्षी हों, या घास के मैदान में नाचती तितलियाँ, या फूलों के ऊपर गूंजती मधुमक्खियाँ, वह सब बनाता।
एक सुबह, अपने घर की दीवार से पीठ टिकाए बैठा वह कोई अच्छा चित्र बनाने के लिए दृश्य ढूँढ रहा था। तभी उसे छप्पर पर एक अजीब-सा जीव दिखाई दिया।
ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी काले चोगे में लिपटा हुआ हो। वह उल्टा लटका हुआ था, अपनी नुकीले पंजों वाले पिछले पैरों से एक लकड़ी के डंडे को पकड़े हुए। और उस जीव का सिर…