एडा, अंकों की रानी

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हर किसी के अंदर कोई न कोई हुनर छिपा होता है। बस उसे खोजने की ज़रूरत होती है। गणित कई बच्चों का सबसे नापसंद विषय होता है। लेकिन छोटी एडा को यह विषय बहुत पसंद है—क्योंकि इसमें होते हैं तर्क आधारित विचार और ढेर सारे अंक! अंकों के प्रति जुनून और गिनती के प्रति अपने प्यार के कारण, एडा ऐसी-ऐसी चीज़ें सोच लेती है जो किसी ने पहले कभी नहीं सोची थीं। अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करके वह पहली इंसान बनती है जो ये साबित करती है कि मशीनें भी सोच सकती हैं...
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एडा, अंकों की रानी
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बहुत समय पहले, ब्रिटेन के एक छोटे से शहर में, एडा नाम की एक छोटी लड़की रहती थी। वैसे तो शहर में कई सारे बच्चे थे, लेकिन एडा उन सबसे अलग थी। उसे सोचना और अपनी तरह के खेल खेलना बहुत अच्छा लगता था।

उसे गुड्डे-गुड़ियों से खेलना और बच्चों के साथ धमाचौकड़ी मचाना पसंद नहीं था। उसे बाहर घूमना अच्छा लगता था। दिमाग में आए किसी भी सवाल के बारे में अंकों की मदद से हिसाब लगाना उसे सबसे ज़्यादा पसंद था।

पेड़ देख वह गिनने लगती, एक, दो, तीन, चार, पाँच… एक पेड़ पर कितनी पत्तियाँ होती हैं? चलते चलते वह सोचती, उसके घर से विद्यालय कितने कदम दूर है? बेट्टी मौसी के घर पर काँच की बरनी में कितनी गोलियाँ भरी जा सकती हैं? उसे हर चीज़ की संख्या जानने की बहुत उत्सुकता रहती। वह उस संख्या के बारे में अपनी डायरी में लिखकर रखती। गिनती करना, हिसाब लगाना उसके लिए दुनिया का सबसे पसंदीदा काम था।

एक दिन, एडा बहुत बीमार पड़ गई। उसकी बीमारी ने उसे इतना कमज़ोर बना दिया था कि वह चल भी नहीं सकती थी। बड़ी मुश्किल से वह उठकर बैठ पाती। हर दिन, वह बिस्तर में लेटी, खिड़की से बाहर आसमान में उड़ते कौओं को देखती रहती। “ओह, ये कौए कितने आज़ाद हैं, जहाँ मन करे वहाँ उड़कर जा सकते हैं, फुर्रर्रर्र... और मैं बिस्तर पर पड़ी हूँ,” उसने आह भरते हुए कहा।

और तभी उसे एक तरकीब सूझी

“अगर मैं भी उड़ पाती तो कैसा होता? मैं पैदल ज़्यादा दूर नहीं चल सकती, अगर मेरे पंख होते तो मैं पूरी सड़क पर उड़ पाती। मैं विद्यालय या बेट्टी मौसी के घर तक उड़कर चली जाती। इतना ही नहीं, मैं लंदन तक भी उड़कर पहुँच सकती थी! पंख फैलाओ और फुर्रर्रर्र से उड़ जाओ।”

उसने फटाफट अपनी पुस्तिका…

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