एक बार की बात है, बहुत समय पहले, एक दूर देश में… शायद भारत में, या फ़ारस में, या तुर्की के शहर एर्ज़ुरम में… छोटे-छोटे हाथों वाली महिलाएँ, बड़ी खूबसूरती से, सूती कपड़े पर रेशम के छोटे-छोटे धागों की गाँठें बाँध रही थीं। एक, दो, तीन… सौ, दो सौ… वे लगातार ऐसा करती रहीं, जब तक कि उन्होंने तीन लाख गाँठें नहीं बाँध दीं! इस तरह उन्होंने एक छोटा लेकिन बेहद ख़ूबसूरत कालीन बना लिया, जिस पर पत्तियों और फूलों के मनमोहक डिज़ाइन थे।
अगर आप उस कालीन को ध्यान से देखते, तो आपको उसमें एक खास बात दिखाई देती। एक फूल की पंखुड़ी उल्टी दिशा में थी। क्या महिलाओं से कोई गलती हो गई थी? बिल्कुल नहीं! उन्होंने इसे जानबूझकर ऐसा बनाया था। पुराने समय में कालीन ऐसे ही बनाए जाते थे। हर कालीन में एक छोटी सी गलती शामिल की जाती थी। यह याद दिलाने के लिए कि इंसान की बनाई कोई भी चीज़ पूरी तरह से परिपूर्ण या त्रुटिरहित नहीं हो सकती।
वह सुंदर रेशमी कालीन, जो पत्तियों और फूलों से सजा हुआ था, एक बड़े बाज़ार की दुकान में काउंटर पर रखा था। रंग-बिरंगी प्रकाश, मूर्तियों, तकियों और खुशबूदार मसालों के बीच वह चमक रहा था और धैर्य से अपने खरीदार का इंतज़ार कर रहा था।
वहाँ पड़े-पड़े वह सोचता था कि आगे उसका क्या होगा। शायद वह दीवार पर टाँगा जाएगा, या ज़मीन पर बिछेगा और अपने मालिक के लिए बिस्तर बनेगा। या शायद किसी को गर्म रखने के लिए कोट की तरह इस्तेमाल होगा, या किसी जानवर की पीठ पर आसन के लिए काठी के तौर पर रखा जाएगा। उन दिनों कालीनों का इस्तेमाल कई तरह से होता था।
यह छोटा कालीन, हालांकि, एक बिल्कुल अलग जीवन का सपना देखता था। जब वह बाज़ार में था, तो वह जादुई चिराग,…