एक बेहद पुराने बगीचा था, जिसमें अलग-अलग प्रकार के फलों के पेड़ आस-पास उगे हुए थे। इनमें दो खुबानी के, एक चेरी और एक आड़ू का पेड़ था। इसके साथ ही कई सेब के पेड़ थे और काली चेरी का एक छोटा पेड़ भी था। कुछ दिनों बाद मौसम में बदलाव हुआ और वसंत ऋतु की जगह, ग्रीष्म ऋतु आ गई। इसके आते ही वातावरण खुशनुमा आवाज़ों से भर गया। इसमें शामिल थी पेड़ों की शाखाओं के नीचे खेलते, लगातार बोलते, हंसते-चिल्लाते बच्चों की आवाज़ें। सूरज भी अपनी धूप से उन बच्चों की नाक गुदगुदाने की कोशिश करता, और जब वह ऐसा करने में कामयाब हो जाता, तो उनकी त्वचा पर हल्के भूरे धब्बे पड़ जाते!
सभी फलों के पेड़ फल-फूल रहे थे। उन पर ताज़े फूल और बिल्कुल नई, कोमल पत्तियां लहरा रही थीं। काली चेरी का पेड़ ही एकमात्र ऐसा था जिस पर सफेद फूल थे। दरअसल, चेरी के पेड़ पर हमेशा सबसे आखिर में फूल खिलते हैं। इस वजह से, काली चेरी को अपने दोस्तों से ईर्ष्या होती थी, क्योंकि वसंत ऋतु की शुरुआत होने से पहले ही उनमें फूल खिलना शुरू हो गए थे, जबकि चेरी के पेड़ की शाखाओं पर अभी तक एक भी पत्ता नहीं आया था। लेकिन कुछ हफ्ते बाद, सब कुछ बदल गया। चेरी का पेड़ ऐसे शानदार फूलों से खिल उठा जो सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत थे। उस पर इतने सारे फूल उग आए थे कि ऐसा लगता था जैसे चेरी का पेड़ एक बड़ा रोएंदार मुलायम बालों वाला कोट पहनकर खड़ा हो। उसके फूलों के रस का स्वाद लेने और उसकी सुंदरता की प्रशंसा करने के लिए, सभी भँवरे दूर-दूर से उसके पास उड़कर आया करते थे।
“हुउउउउउउ, हुउउउउउ, सुंदररररर, सुंदररररर, चेरी भाई आप बहुत सुंदर दिखते हो,” भँवरे ने चेरी की तारीफ़ में भिनभनाते हुए कहा।
“हमने बहुत…