शहर से बहुत दूर, बागों, जंगलों और नदियों के बीच, सब्ज़ियों के खेत की रखवाली करने के लिए वहां एक बिल्लू नामक बिजूका खड़ा था। बिजूका यानी पक्षियों को डराने वाला लकड़ी का पुतला। वह एक बहुत ही अच्छा बिजूका था। सारे कौवे और ख़रगोश उससे दूरी बना कर रखते और गलती से भी उसकी फसलों की ओर आने की हिम्मत नहीं करते थे।
पर ऐसा नहीं था कि केवल जंगली जानवर ही उससे डरते थे। खेतों में रहने वाले जानवर भी उससे दूरी बनाकर रखते। कोई भी बिल्लू बिजूका के पास नहीं जाना चाहता था। कोई जाता भी कैसे, उसके बारे में इतनी भयानक कहानियां जो फैली हुई थीं।
“मैंने सुना है, वो बात भी नहीं कर सकता,” कबूतर ने अपनी गर्दन घमंड में हिलाते हुए कहा। “मुझे नेवले से पता चला है।”
“मुझे ये जानकर ज़रा भी आश्चर्य नहीं हुआ। ज़रा इसकी तरफ देखो, इसने कितना फटा पुराना कोट और टोपी पहनी हुई है,” भेड़, जो फैशन के बारे में बहुत कुछ जानती थी, मिमियाते हुए बोली। आख़िर उसकी ऊन से नर्म मुलायम स्वेटर जैसे ऊनी कपड़े और मोज़े जो बनाए जाते थे।
“और जब हमारे झुंड में से एक गाय ने उसकी ओर देखा तो उसने गाय को देखकर इतनी बुरी तरह भौंहे सिकोड़ी कि उस गाय ने अपना दूध देना ही बंद कर दिया,” गाय ने रहस्यमय तरीके से रंभाते हुए कहा।
“अरे बाप रे! अच्छा होता अगर वह जीव यहाँ होता ही नहीं,” डरी हुई मुर्गियाँ कुकड़ाते हुए अपने चूज़ों को अपने पास समेटने लगीं। वे उन्हें एक पल के लिए भी अपनी नज़रों से दूर नहीं होने देती थीं। कौन जाने क्या हो जाए!
“तुम सबके लिए अच्छा होगा कि उस खेत की तरफ़ जाओ ही मत,” कुत्ते ने सलाह देते हुए कहा।
बिल्लू बिजूका बहुत दुखी था।…