छोटी रेलगाड़ी के सुनहरे दिन लौटे!

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पुरानी चीज़ों की जगह नई चीज़ें लाना हमारी आदत में शामिल है – ऐसी चीज़ें जो ज़्यादा अच्छी और आधुनिक हैं। एक पुरानी रेल गाड़ी को भी यही सीखने को मिला, लेकिन एक मुश्किल तरीके से। वह नए ज़माने की माँगों को पूरा नहीं कर पाई और उसकी जगह बेहतर, उच्च-गति की रेलगाड़ियों ने ले ली। निष्ठापूर्वक की गई वर्षों की सेवा के बाद, छोटी रेलगाड़ी को डिपो के एक ठंडे और अंधेरे कोने में ऐसे छोड़ दिया गया, जैसे वह केवल जंग लगा हुआ बेकार धातू का टुकड़ा हो। अब वह सिर्फ उन खुशहाल दिनों को याद करती है, जब वह परिवारों और बच्चों को पहाड़ों की सैर पर ले जाया करती थी।
या फिर… क्या अभी भी कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे इस पुरानी रेलगाड़ी के भाग्य की परवाह है? इस कहानी में आप यह जान पाएंगे।
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पहाड़ियों के ऊपर गाँवों के बीच से होकर गुजरने वाली एक छोटी सी रेलवे पटरी थी, जिस पर एक पुरानी रेलगाड़ी चला करती थी। यह ‘छुक-छुक, छुक-छुक’ आवाज़ करती, धीमी चलने वाली एक छोटी रेलगाड़ी थी। लेकिन वो समय ऐसा था जहाँ उसे तेज़ रफ़्तार से दौड़ने की कोई ज़रूरत भी नहीं थी।

ज़्यादातर परिवार ही इस छोटी रेलगाड़ी के यात्री होते थे, जो बच्चों के साथ पहाड़ों की सैर के लिए आते थे। उन्हें हमेशा यह सुकून भरा सफ़र करने में बहुत मज़ा आता था – खासकर बच्चों को। उन्हें खिड़की से बाहर का नज़ारा देखना बहुत अच्छा लगता था। ऊपर चढ़ती रेलगाड़ी की खिड़की से ऐसा लगता था जैसे ग्रामीण इलाकों की ख़ूबसूरत वादियाँ पीछे और नीचे की ओर सरकती जा रही हैं।

जैसे-जैसे यह रेलगाड़ी छुक-छुक करते हुए ऊपर की ओर बढ़ती थी, आस-पास के दृश्य और भी सुंदर हो जाते थे। पहाड़ की ढलानों पर गायें चरती दिखाई देती थीं, पटरियों के पास नीले रंग की छोटी-छोटी झीलें थीं जिनमें मछलियाँ तैर रही होती थीं, और एक किले के खंडहर भी दिखते थे – जहाँ बहुत समय पहले शायद किसी महान राजा का राजपाट रहा होगा। कहीं-कहीं हल्के भूरे रंग की हिरनियाँ अपने छोटे मृग-शावकों के साथ दिखाई देती थीं। यह बहुत ही शानदार और सुंदर मार्ग था।

लेकिन समय बदला और इसके साथ यात्रा की रफ्तार भी ज़्यादा तेज़ होती गई। अब तेज़ी से दौड़ने वाली उच्च-गति रेलगाड़ियाँ रेलवे पर हावी हो गई हैं। इनमें लोग एक जगह से दूसरी जगह इतनी जल्दी पहुँच जाते हैं कि यात्रा का आनंद लेने का समय ही नहीं रहता। ये रेलगाड़ियां इतनी तेज़ चलती हैं कि खिड़की के बाहर गांवों का नज़ारा केवल हरे और भूरे रंग की धुंधली लकीरों जैसा ही दिखता है।

हमारी छोटी रेलगाड़ी अब बहुत कम ही बाहर जाती थी, और आख़िरकार…

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