शरद ऋतु का आगमन हो गया था। प्रकृति ने पत्तियों पर अपना जादू बिखेर दिया था और उनका रंग लाल, भूरा और सुनहरा हो गया था। शाखाओं और झाड़ियों के बीच से एक ताज़ा, ठंडी हवा बह रही थी। प्रवासी पक्षी धीरे-धीरे जाने के लिए तैयार हो रहे थे, इसलिए जंगल के जानवरों ने उनके लिए एक विदाई समारोह का आयोजन किया। हर जानवर चाहता था कि वह अच्छा दिखे: इसके लिए वे अपने पंजे घिस रहे थे, अपने कोट को ब्रश से साफ़ कर रहे थे और अपने शरीर के घने मुलायम बालों में छिपे पिस्सुओं को बाहर निकाल रहे थे।
बिल्कुल ऐसा ही कर रही थी रोएँदार बालों वाली सोफ़ी नामक लोमड़ी। वह आईने के सामने घूमी और खुद को हर तरफ से देखा। उसने अपनी नाक के आगे वाले हिस्से यानी थूथन को चिकना किया, अपने गोल चश्मे को चमकाया और अपने रोएंदार बालों पर सुगंधित पानी छिड़का। और इसके बाद ही वह बाहर जाने के लिए निकली।
जंगल के बीच खाली जगह में पहले से ही उजाला हो चुका था। हर कोने में सूरज की गर्म किरणें चमक रही थीं और हर जगह चहचहाहट और हंसी की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।
सोफ़ी को साफ-सुथरा और अच्छा महसूस हो रहा था। वह उस शोर मचाती जानवरों की भीड़ में घुलमिल गई। अचानक, उसने पड़ोस के जंगल से आई दो लोमड़ियों को देखा। दोनों के पास चमकदार घने रोएँदार बाल, चिकने थूथन, नुकीले पंजे और गर्व से लहराती शानदार, झाड़ीदार पूँछ थी।
सभी को लगा कि वे कार्यक्रम में आई सबसे सुंदर लोमड़ियाँ थीं। सोफ़ी ने अपनी पूँछ को देखा। अभी कुछ देर पहले ही वह प्यार से पूँछ पर कंघी कर रही थी। अचानक उसे वह पूँछ छोटी, गंदी और बदसूरत लगने लगी।
"उसकी पूँछ तो देखो। वह कुत्ते जैसी दिखती है," एक…