भावनाओं की खोज: उदासी

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राहुल धीरे-धीरे अपनी इमारत की अलग-अलग मंज़िलों पर रहने वाले पड़ोसियों को जानने लगा है। उनके बारे में नई बातें जानने के साथ-साथ वह अलग-अलग भावनाओं से भी परिचित हो रहा है। हम पहले ही उसके संग गुस्से और डर की भावनाओं के अनुभवों में साथ रह चुके हैं, और अब वह मिलने वाला है — उदासी से।
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भावनाओं की खोज: उदासी
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हमारी इमारत की दूसरी मंज़िल पर एक बुज़ुर्ग आदमी रहते थे। कुछ साल पहले, जब मैंने विद्यालय जाना शुरू भी नहीं किया था, तब मुझे लगता था कि वे असल में हैं ही नहीं, क्योंकि मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं था। लेकिन फिर एक दिन लिफ्ट में मेरी उनसे मुलाकात हुई।

जब मैं लिफ्ट में चढ़ा तो उन्होंने उदास आवाज़ में पूछा, “बेटा, कौन-सी मंज़िल पर जाना है?”

“छठी,” मैंने नज़रें झुकाकर जवाब दिया। माँ ने कहा था कि अजनबियों से बात नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि मुझे नहीं पता था कि ये हमारे पड़ोसी हैं, इसलिए मैंने बातचीत शुरू नहीं की।

“इतने ऊपर… लगभग स्वर्ग तक,” उस बुज़ुर्ग ने मज़ाक करने की कोशिश करते हुए कहा, लेकिन ‘स्वर्ग’ शब्द बोलने के बाद वे और भी उदास लगने लगे।

लिफ्ट दूसरी मंज़िल पर रुक गई।
“अच्छा, तुम्हारा दिन शुभ हो — मुझे इसी मंज़िल पर उतरना है,” उन्होंने कहा।

और वही पहली और आख़िरी बार था जब हम मिले। कभी-कभी, जब मैं अपने दोस्तों के साथ खेल के मैदान में खेल रहा होता, तो मुझे उनकी एक झलक दिखाई देती — वे खिड़की के पास बैठे दूर कहीं देख रहे होते। लेकिन बस इतना ही।

फिर आज, मैं उनके दरवाज़े पर दस्तक देने गया! मैं थोड़ा घबराया हुआ था, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि उन्हें मेरे बारे में कुछ याद भी होगा या नहीं।

मैं सीढ़ियों से गया और कुछ पल उनके दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा। दरवाज़े की घंटी के ऊपर नाम लिखा था — शशिकांत सिन्हा।

मैंने दस्तक दी। अंदर कुछ सरसराने की आवाज़ आई। फिर दरवाज़ा खुला। उस बुज़ुर्ग ने यह तक नहीं पूछा कि दरवाज़े पर कौन है। पहली मंज़िल पर रहने वाली वृद्ध महिला श्रीमती कमला मेहता जितने वे घबराए हुए नहीं थे!

“नमस्ते, सिन्हा अंकल,” मैंने जितना…

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