माइकी एक छोटा सा बच्चा था, जो तीसरी कक्षा में पढ़ता था। एक सुबह जब वो जागा, तो बड़ी सुस्ती से अपने कपड़ों को संभालता हुआ सबसे पहले किचन तक गया। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसे अभी भी नींद आ रही थी क्यूंकि उसे अभी भी जम्हाई आ रही थी।
उसका बड़ा भाई पहले ही बहुत देर से जागा हुआ था। उसके कमरे से आ रही आवाज से लग रहा था कि वह वायलिन बजा रहा है। माइकी ने अपना सिर पकड़ लिया और अपनी उंगलियों से अपने कान बंद कर लिए और सोचने लगा कि काश वह फिर से जाकर सो पाता।
माइकी की मां ने उससे कहा, “जल्दी करो। अपनी सार्डिन मछली खाओ, नहीं तो तुम्हें स्कूल के लिए देर हो जाएगी।”
मछली के डिब्बे को देखकर माइकी ने अपनी नाक सिकोड़ ली। “सार्डिन? ओह... इसको खाने के बजाय तो मैं कुछ भी खा लूंगा!”
अचानक, डिब्बे के अंदर कुछ हलचल हुई। उसे लगा जैसे एक गोल्डन सार्डिन मछली ने उसे आंख मारी थी। माइकी को एक फुसफुसाहट की आवाज़ आई। “जैसा तुम चाहो” एक मादा मछली की आवाज ने कहा।
अचानक न जाने कहां से उसके सामने मेज़ पर सॉसेज का डिब्बा, मटर, मक्का, कीनू जैम, शहद और मक्खन, आ गए। लेकिन वे सभी छोटे-छोटे डिब्बों में थे। माइकी को विश्वास नहीं हुआ। उसने एक बार फिर भोजन को देखा, फिर दोबारा मछली के डिब्बे को देखा। उसे लगा कि वह ज़रूर कोई सपना देख रहा था।
लेकिन यह कोई सपना नहीं था। सामने दिख रही गोल्डन सार्डिन मछली फिर से बोली, "मैं एक सुनहरी मछली हुआ करती थी। अब मैं सिर्फ एक सुनहरी डिब्बाबंद सार्डिन हूं, लेकिन अगर तुम मुझे नहीं खाओगे तो मैं अभी भी तुम्हारी एक या दो इच्छा पूरी कर सकती हूं!"
"मैं तुम्हें बिल्कुल…