तीसरी मंज़िल पर रहने वाले आदमी का नाम श्री मुरलीधर नायर है, और वो बहुत ही अजीब किस्म के इंसान हैं।
एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ हमारी इमारत के सामने वाले खेल के मैदान में खेल रहा था, तभी अचानक एक धमाका हुआ। तीसरी मंज़िल की खिड़की से बैंगनी रंग का धुआँ निकलने लगा, और हमें किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। लेकिन वह डर की चीख नहीं लग रही थी; वह तो ऐसी खुशी भरी चीख थी जैसी लोग बहुत ज़्यादा आनंद होने पर निकालते हैं।
हम सब दौड़कर इमारत के अंदर गए और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए तीसरी मंज़िल तक पहुँचे। वहाँ हमने देखा कि कई और पड़ोसी भी पहले से इकट्ठे हो चुके थे। हमने दरवाज़ा खटखटाया और उन्हें आवाज़ लगाई, लेकिन बहुत देर बाद नायर अंकल ने दरवाज़ा खोला। वे हैरान दिख रहे थे।
“अरे, क्या बात है? आप सब यहाँ क्यों खड़े हैं? क्या कोई महत्वपूर्ण जानकारी सुनने से मैं चूक गया हूँ?”
“यहाँ अंदर क्या चल रहा है?!” हमारे हमेशा चिड़चिड़े रहने वाले मकान-मालिक, कपूर अंकल, गरजकर बोले। “तुमसे कोई चूक हो गई, है ना! तुम यह भूल गए कि इस इमारत में जादू-चमत्कार करना सख्त मना है!!” वे इतनी ज़ोर से गुस्से में बड़बड़ाए कि उनके माथे की नीली नस उभर आई।
उसके बाद मुझे पूरा यक़ीन हो गया कि नायर अंकल ज़रूर कोई जादूगर हैं। आख़िर और क्या वजह हो सकती थी कि वे जादू कर रहे थे? लेकिन मेरी माँ ने बताया कि वे असल में एक आविष्कारक हैं।
हमारे शिक्षक ने भी कला की एक कक्षा में आविष्कारकों के बारे में कुछ बताया था। वह तब की बात थी जब मेरा सहपाठी सचिन लॉलीपॉप की लकड़ी और धागों से ब्रश बनाने की कोशिश कर रहा था। उस दिन वह अपने रंग करने…