आज हम एक ऐसे फार्म में जा रहे हैं, जहाँ कई तरह के जानवर रहते हैं। दिन बस ख़त्म होने वाला है—अभी! अंधेरा धीरे-धीरे पूरे फार्म को ढकने लगा है। चमकता हुआ सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के नीचे छिपने लगा है।
हल्की ठंडी हवा अब भी आस-पास के हरे मैदानों में बह रही है और नरम घास और फूलों को हल्के से सहला रही है। वे धीरे-धीरे उसकी लय में झूम रहे हैं और अपनी पंखुड़ियाँ बंद कर रहे हैं। यहाँ तक कि नन्हे झींगुर भी अपनी रात की आखिरी धुन ख़त्म करने वाले हैं। वे सभी कह रहे हैं कि अब समय आ गया है कि हम फार्म के सभी जानवरों को शुभरात्रि कहें।
आओ, ज़रा खलिहान के अंदर झाँकते हैं। वहाँ एक सफेद और भूरे रंग की गाय रहती है, जिसकी बड़ी-बड़ी भूरी आँखें हैं और जिसकी गर्दन में एक घंटी बँधी हुई है। प्यार से उसके सिर को सहलाओ। वह हल्की-सी अंगड़ाई लेने लगती है और जल्द ही एक नर्म कोना ढूँढेगी अपनी आखरी जम्हाई के लिए। थोड़ी देर में, वह नींद से भरी अपनी आँखें बंद कर लेगी। उसके बाद हम धीरे से बाहर निकल जाते हैं और निकलते-निकलते मोमबत्ती बुझा देते हैं ताकि वह गाय अंधेरे में आराम से सो सके।
तालाब में तैरती बतखें भी सोने की तैयारी कर रही हैं। वे अपने पंखों को अच्छे से साफ़ कर के संवार रही हैं ताकि वे अपनी थकी हुई गर्दन को उनमें छुपाकर मीठी नींद ले सकें। तालाब की सतह पर हल्की-हल्की लहरें हैं जो उन्हें झूला झुला रही हैं। छोटी-छोटी लहरों में हिलते-डुलते उन्हें और भी मीठे सपने आते हैं। देखो, ऐसा लग रहा है कि वो तो सो भी चूकी।
हम भी जल्द सोने चलेंगे। लेकिन पहले एक बार नन्हे सूअरों को देख लेते हैं। वे चारों पहले…