पाठशाला में भोलू भँवरा

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कीटों और परागणकर्ता जीवों की इस अनोखी पाठशाला की एक झलक देखें, और भोलू नामक एक चंचल भँवरे की कहानी का आनंद लें। इस कहानी में आप न केवल एक कीटों की कक्षा में होने वाली गतिविधियों को जानेंगे, बल्कि यह भी देखेंगे कि भोलू भँवरा अपनी बेचैनी, ध्यान की कमी और अत्यधिक ऊर्जा जैसी समस्या से कैसे निपटता है।
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पाठशाला में भोलू भँवरा
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एक जंगल के किनारे एक पुराना टेढ़ा-मेढ़ा पेड़ हुआ करता था। सूरज हर दिन उसके ऊपर अपनी किरणें बिखेरता, और वह आराम से अपनी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ फैलाए रहता। अब यह पेड़ लगभग पूरी तरह काई से ढक चुका था। इसे देखकर कोई नहीं बता सकता था कि इसकी शाखाओं के बीच कीड़ों की एक पाठशाला छिपी हुई है।

सचमुच! शाखाओं के बीच छोटी-छोटी ‘कक्षाएँ’ बनी हुई थीं। एक में मकड़ी के बच्चे नाज़ुक जाले बुनना सीख रहे थे; दूसरी में रंग-बिरंगे भँवरे इधर-उधर फुदक रहे थे। तीसरी में फुर्तीले टिड्डे और झींगुर पागलों की तरह कूद-फांद कर रहे थे। और पेड़ की सबसे ऊँची शाखाओं पर मधुमक्खी, तितली, भँवरे, मक्खी जैसे परागणकर्ता कीटों की कक्षाएँ थीं।

इन छोटे कीटों के लिए यह पेड़ दूसरे घर की तरह था, और वे अच्छी तरह से इसकी देखभाल भी करते थे। शायद इसी वजह से यह पेड़ आस-पास के सभी पेड़ों से ज़्यादा फल देता था — मानो अपने नन्हे साथियों को इनाम दे रहा हो।

आज एक परागणकर्ताओं की कक्षा में कुछ खास हलचल थी… भँवरे सूखे पत्तों पर फूलों के चित्र बना रहे थे।

“हर परागणकर्ता को हर तरह के फूलों के बारे में उतनी ही अच्छी तरह जानना चाहिए, जितना वे अपने पंखों को जानते हैं!” उनकी सख्त अध्यापिका, श्रीमती भिनभिनेश्वरी ने कहा। “प्रिमरोज़ यानी वसंत ऋतु में खिलने वाला बसंती गुलाब, क्लोवर यानी तिपतिया घास का फूल, लैवेंडर यानी हल्का बैंगनी रंग का सुगंधित फूल, डैंडेलियन यानी सिंहपर्णी… सब की जानकारी होनी चाहिए!”

भोलू भँवरा अपने साथियों को देख रहा था, जो अपनी छोटी टांगों को ब्रश बनाकर सुंदर पंखुड़ियाँ और पत्तियाँ बना रहे थे। उसने देखा कि चतुर जुड़वाँ भँवरे तो लगभग अपना काम पूरा कर चुके थे।

“भोलू, तुम फिर से हिल-डुल रहे हो!” अध्यापिका श्रीमती भिनभिनेश्वरी ने डाँटा। “तुमने तो अभी…

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