

जब शार्लेट अपने पिता के साथ विद्यालय जा रही थी, तभी उसने आगे दो रंग-बिरंगे
“पिताजी,” उसने उनकी आस्तीन खींचते हुए कहा, “मुझे लगता है वहाँ मेले के झूले लगे हैं!”
“बिलकुल सही, शार्लेट, आज मेला शुरू हो रहा है। क्या हम पास जाकर थोड़ा देख लें?”
छोटी सी शार्लेट खुशी से उछल पड़ी और उत्साह में सिर
शाम को, पूरा परिवार मिलकर मेले में गया। तब तक सारे झूले और दुकानें सज चुकी थीं, और हर दिशा में तेज़, खुशमिज़ाज संगीत
“मुझे हंस वाला झूला और गोल झूला दोनों पर बैठना है,” शार्लेट ने उत्साहित होकर कहा। “और मुझे बुढ़िया के बाल और एक मीठी पेस्ट्री भी चाहिए, पिताजी!”
तभी उसकी माँ भी मुस्कुराते हुए शार्लेट के पिता से बोलीं, “और आपको मेरे लिए उस गेंद फेंकने वाले खेल से कुछ अच्छा जीतकर लाना होगा।”
शार्लेट और उसकी माँ हंस वाले झूले की
“यह तुम्हारे लिए है, मेरी प्यारी बच्ची,” उन्होंने मुस्कुराते हुए शार्लेट को पीला गुलाब दिया। “और लाल वाला तुम्हारी माँ के लिए। क्या अब तुम भी कोशिश करना चाहोगी,?” शार्लेट…