

आज जीवाणु, कीटाणु, सड़न और अन्य विभिन्न संक्रामक रोगों के विद्यालय में अलग-अलग प्रकार की मज़ेदार गतिविधियाँ चल रही थी। सबसे अधिक मज़ा पहली कक्षा में आया।
जैसा कि नाम से ही पता चलता है, सभी छोटे-छोटे कीटाणु, विषाणु, गंदगी और बीमारियां इस विद्यालय में
दरअसल जीवाणु, कीटाणु, सड़न, इत्यादि का विद्यालय, एक असल विद्यालय भी नहीं था। यह सिर्फ लालची जीवाणु और कीटाणु थे जिन्होंने मनुष्यों के एक असली विद्यालय पर कब्ज़ा कर लिया था। हर कक्षा में, उन्हें नज़रों से ओझल हो चुका कोई पुराना धूल का ढेर मिल गया था, जिसमें वे छिपकर बैठ गए थे।
सबसे महत्वपूर्ण बात थी, एक ऐसी जगह ढूंढ़ना जो जितना हो सके उतना साबुन और पानी से दूर हो, क्योंकि जीवाणु विद्यालय के छात्रों को साबुन और पानी से सबसे ज़्यादा नफ़रत थी, जैसी की आप लोगों को भी होती है। इसलिए वे सबसे अंधेरे कोने में धूल-मिट्टी के ढेर में हर वक्त रहा करते थे, बस यही उनका
और इसलिए जब पहली कक्षा में पढ़ रहे मनुष्यों के बच्चे कड़ी मेहनत से पढ़ाई कर रहे थे, उसी कक्षा में गंदे कीटाणु, आलस के साथ इधर-उधर घूम रहे थे, बढ़ रहे थे, और सोच रहे थे कि आज वे कौनसी गंदगी,